Friday, December 9, 2011


साइडिंग्स में समय की हेराफेरी 

लोडिंग पार्टियों का डेमरेज बचाकर परिचालन 

अधिकारीयों की अवैध कमाई का गोरखधंधा 

चक्रधरपुर : आयरन ओर की लोडिंग से होने वाली 'कमाई' लगभग ख़त्म हो जाने से दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल की करीबन सभी साइडिंग्स में रेकों के आने और उनके प्लेसमेंट की टाइमिंग्स में हेराफेरी करके अवैध कमाई के नए जरिए निकाल लिए गए हैं. बताते हैं कि इस हेराफेरी में मुख्यालय से लेकर मंडल तक के लगभग सभी सम्बंधित परिचालन अधिकारी शामिल हैं. विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चक्रधरपुर मंडल की देवझार साइडिंग में दि. 19.08.2011 कि रात 12.05 बजे एक पार्टी का रेक पहुंचा था, जिसका प्लेसमेंट करीब सवा छह घंटे बाद दि. 20.08.2011 कि सुबह 6.20 बजे दिखाया गया था. इसी प्रकार इसी साइडिंग में इसी तारीख को जिंदल का एक रेक 22.25 बजे पहुंचा था, जबकि इस बॉक्स एन रेक को दि. 20.08.2011 की सुबह 4.15 बजे प्लेस दिखाकर लगभग छह घंटे का डेमरेज भरने से पार्टी को बचा लिया गया. इसके अलावा दि. 06.09.2011 को बाराजाम्दा स्टेशन पर कोर मिनरल्स का एक रेक शाम 5.09 बजे पहुंचा था. इसका प्लेसमेंट अगले दिन सुबह 6.09 बजे दर्शाया गया. इस प्रकार पार्टी का करीब 13 घंटे का डेमरेज बचाया गया और रेलवे को इस तरह से लाखों का चूना लगाया गया है. 

मंडल के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि कमोबेस यही स्थिति नोवामुंडी साइडिंग की भी है. सूत्रों का कहना है कि यहाँ भी कई पार्टियों का डेमरेज बचाकर रेलवे को भारी नुकसान पहुँचाया जा रहा है. जिसकी एवज में सम्बंधित परिचालन अधिकारियों की बड़ी मात्रा में अवैध कमाई हो रही है. सूत्रों ने बताया कि लोडिंग पार्टियों का डेमरेज बचाने के लिए ही उनके रेकों के प्लेसमेंट के समय में हेराफेरी करके यह सारा गोरखधंधा चल रहा है. सूत्रों का कहना है कि यह सारा गोरखधंधा यहाँ एक दलाल द्वारा मंडल परिचालन अधिकारियों की मिलीभगत से चलाया जा रहा है. सूत्रों ने बताया कि यह दलाल वरिष्ठ मंडल परिचालन अधिकारी का बहुत करीबी है, जो कि रेड लाइट लगाकर इसके साथ अधिकाँश समय अपने चेंबर में बैठे रहते हैं. बताते हैं कि मंडल परिचालन कार्यालय के ज्यादातर कर्मचारियों को न सिर्फ इस दलाल (एजेंट) को सलाम करना पड़ता है, बल्कि उनका तो यह भी कहना है कि वे तो इस दलाल को ही अब अपना मुख्य मंडल परिचालन अधिकारी मानने लगे हैं, क्योंकि स्टाफ की मनचाही जगह ट्रांसफ़र/पोस्टिंग में भी इस दलाल की प्रमुख भूमिका रहती है. 

इस समबन्ध में नाम न उजागर करने की शर्त पर कुछ असंतुष्ट पार्टियों का कहना है कि चूँकि आयरन ओर लोडिंग की अंधाधुंध अवैध कमाई अब बंद हो गई है, इसलिए पार्टियों का डेमरेज बचाकर और रेलवे को चूना लगाकर सम्बंधित परिचालन अधिकारियों द्वारा अपनी जेबें खूब भरी जा रही हैं. उनका यह भी कहना था कि इसीलिए मंडल की सभी लोडिंग/अनलोडिंग साइडिंग्स में न सिर्फ रेकों के आने और उनके प्लेसमेंट की टाइमिंग्स में भारी हेराफेरी की जा रही है, बल्कि छोटी पार्टियों को रेक न देकर, लोडिंग/अनलोडिंग एवं प्लेसमेंट के लिए परेशान करके उन पर अकारण डेमरेज लगाया जाता है. उनका कहना है कि बड़ी पार्टियों का न सिर्फ डेमरेज बचाया जाता है, बल्कि उनसे प्रति रेक वसूली अलग से की जाती है, जिससे सम्बंधित अधिकार खूब मालामाल हो रहे हैं. 

इस पूरे प्रकरण पर 'रेलवे समाचार' ने सम्बंधित परिचालन अधिकारियों पक्ष जानने की बहुत कोशिश की, मगर उन्होंने काल रिसीव नहीं किया. चक्रधरपुर मंडल के सीनियर डीओएम श्री मनोज कुमार और सीनियर डीसीएम श्री हालदार से जब उनके मोबाइल पर बात करने की सारी कोशिशें विफल रहीं, तब इस सम्बन्ध में मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) श्री अचल खरे को मोबाइल पर बात करके उपरोक्त सारी हेराफेरी की विस्तृत जानकारी देकर उन्हें मामले की गंभीरता से अवगत कराया गया. तत्पश्चात उन्हें एसएमएस से भी सारी जानकारी दी गई. श्री खरे ने यह जानकारी देने के लिए 'रेलवे समाचार' को धन्यवाद् देते हुए कहा कि वे इसकी पूरी छानबीन करवाएँगे, क्योंकि उन्हें इस बारे में फ़िलहाल कोई जानकारी नहीं है. 
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Monday, December 5, 2011


सरकारी साइडिंग से निजी कंपनियों को 
अवैध रूप से दी जा रही है लोडिंग अनुमति  
बिलासपुर : कुछ कंपनियों को सरकारी (एनटीपीसी) साइडिंग से लोडिंग और कुछ कंपनियों को सरकारी (रेलवे) जमीन पर साइडिंग बनाने की अनुमति देकर कुछ ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा इन निजी क्षेत्र की कंपनियों को संरक्षण प्रदान किया जा रहा है. यही नहीं, इन कंपनियों को करोड़ों रुपये का लाभ पहुंचाकर इनमे या तो इन अधिकारियों द्वारा हिस्सेदारी की जा रही है, या फिर इनसे अपनी 'हिस्सेदारी' वसूल की जा रही है. ज्ञातव्य है कि इन ट्रैफिक अधिकारियों ने सैकड़ों करोड़ के सालाना टर्नओवर वाले कुछ ऐसे कार्पोरेट घराने खड़े कर दिए हैं, जो कल तक रेलवे की साइडिंग या गुड्स शेडों में लोडिंग/अनलोडिंग कांट्रेक्टर हुआ करते थे अथवा दो-चार रेक की लोडिंग किया करते थे. अब यही लोग बड़ी कंपनियों के मालिक बनकर उन ट्रैफिक अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी कंपनियों में नौकरी पर रख रहे हैं, जिन्होंने रेलवे की नौकरी में रहते हुए इन्हें पर्याप्त लाभ पहुँचाया था तथा ये पूर्व ट्रैफिक अधिकारी इन निजी कंपनियों के नौकर होकर अब अपनी पुराणी जगहों पर पदस्थ अपने जूनियर्स की मदद से न सिर्फ निजी कंपनियों को भरी फायदा पहुंचा रहे हैं, बल्कि अपने जूनियर्स को भी दबाव में लेकर भ्रष्ट बना रहे हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ कंपनियों की अपनी कोई साइडिंग नहीं है. परन्तु रेलवे बोर्ड और जोन तथा मंडलों के कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की मेहरबानी से इस कंपनी को बिलासपुर के पास स्थित एनटीपीसी की सरकारी साइडिंग से कोयला लोडिंग की अनुमति मिली हुई है. जो कि गैर-क़ानूनी है. बताया जाता है कि एनटीपीसी की इस साइडिंग से इन कंपनियों द्वारा प्रतिमाह सैकड़ों रेक कोयले की लोडिंग की जाती है. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि रेलवे बोर्ड और जोन के ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा एनटीपीसी को अपनी साइडिंग से अन्य कंपनियों को लोडिंग करने देने के लिए 'को-यूजर' परमीशन दी जाती है, जो कि पीएफटी पॉलिसी आने के बाद पूरी तरह गैर-क़ानूनी है. क्योंकि एनटीपीसी की निजी साइडिंग को पीएफटी में कन्वर्ट करने के बाद ही इससे अन्य कंपनियों को लोडिंग की छूट दी जा सकती है. सूत्रों का कहना है कि यह गोरखधंधा वास्तव में काफी समय से नीचे से ऊपर तक की मिलीभगत से चल रहा है. सूत्रों के अनुसार निजी कंपनियों द्वारा एनटीपीसी की साइडिंग से लोडिंग करने के लिए प्रति रेक लाखों रु. की राशि जोन और रेलवे बोर्ड के ट्रैफिक अधिकारियों को पहुंचाई जाती है..? 

रेलवे की जमीन पर साइडिंग बनाकर मालामाल हुई कंपनी 
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक कंपनी ने कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की मिलीभगत से रायपुर के पास सिलियरी में और रायगढ़ के पास भूपदेवपुर में रेलवे की जमीन पर अपनी दो साइडिंग बनाकर इन बीते पांच सालों में ही अपनी ग्रोथ को कई गुना बढ़ाया है. बताते हैं कि सिलियरी साइडिंग से इस कंपनी द्वारा प्रतिमाह 35 से 40 रेक और भूपदेवपुर साइडिंग से प्रतिमाह 55 से 60 रेक की लोडिंग की जाती है. सूत्रों के अनुसार रेलवे की जमीन पर निजी पार्टियों/कंपनियों को अपनी निजी साइडिंग बनाने की अनुमति नहीं है. इस कंपनी द्वारा रेलवे की जमीन पर बनाई गई उक्त दोनों साइडिंग पूरी तरह गैर-क़ानूनी है. यहाँ इस मामले में रेलवे के ट्रैफिक विशेषज्ञों की राय ज्यों की त्यों प्रस्तुत है..

As per Railways Policy, the private sidings were allowed to be developed by end-users. These private sidings were meant to be used by the end user himself who has constructed the siding. But if Railways permission was taken, the siding could be used by third parties also. This arrangement was called as ‘co-user’; in which the siding owner and user had to apply to the railways to allow certain specific party as ‘co-user’. Railways used to examine this request on case to case basis for every third party and used to allow the ‘co-user’ status for a specified period or regret it as the case may be.

For construction of private siding, the intending party MUST be an end user, ie. Either an industry or mine owner, etc., who intends to use the same for his own business. 

Before construction of private siding, party has to obtain RTC (Rail Transport Clearance) from Railway Board. This RTC was granted/rejected by the Railway Board after examining the likely traffic to be dealt in the proposed siding by the end user. The intending party had to provide the full detail of its production plans, the likely inward and outward traffic along with the originating and destination stations for the same. Here again the RTC could be granted to the end user only. 

Referenced companies are not an end users. Thus they neither should have been issued RTC nor should have been allowed to construct the private siding. 

It is most unfortunate that the party who should not have been allowed to construct private siding even on private land had been allowed to construct the same on railway land flouting all rules and regulations. 

Further, after the issue of the PFT Policy (FM Circular No. 14 of 2010) as amended, all the private sidings handling third party cargo MUST convert to PFT. Thus on date there cannot be a private siding handling ‘third party cargo’ unless it has been converted into a PFT. 
But in case of above refered companies, this conversion into PFT is not possible as PFT can only be on private land and a particular company is functioning on Railway land. 
This continuance of that particular company is totally illegal. 

Note: Last two paragraphs apply to NTPC, Sipat also. As on date their siding cannot be used by ‘third-party’ as ‘co-user’. Unless the siding of NTPC is converted into PFT its use by third party is illegal. 

उपरोक्त स्पष्टीकरण से यह एकदम स्पष्ट है कि न सिर्फ उक्त कंपनी की रेलवे की जमीन पर बनाई गई उपरोक्त दोनों साइडिंग अवैध और गैर-क़ानूनी हैं बल्कि निजी कंपनियों को एनटीपीसी की साइडिंग से रेल अधिकारियों द्वारा दी जा रही लोडिंग सहूलियत भी अवैध एवं गैर-क़ानूनी है. सूत्रों का कहना है कि इन सारी सहूलियतों को ख़त्म कर देना रेलवे बोर्ड और जोन के ही अधिकार में है, मगर यहाँ यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि इन अवैध गतिविधियों को बंद कराने की अपेक्षा रेलवे की जमीन पर अवैध एवं गैर-क़ानूनी रूप से दो साइडिंग बना लेने वाली कंपनी को और चार साइडिंग बनाने की अनुमति जोन के दायरे में दे दी गई है, जिनका निर्माण काफी जोरशोर से चल रहा है. यही नहीं, इसकी मांग पर इसे बढाकर प्रतिमाह 100 रेक लोड करने की अनुमति भी दे दी गई है, जो कि काफी लम्बे अरसे से पेंडिंग थी.. 

चूँकि रेलवे के कई कार्यरत और सेवानिवृत्त ट्रैफिक अधिकारियों का पैसा उपरोक्त प्रकार की तमाम कंपनियों में लगा हुआ है, और चूँकि कई अन्य अथवा जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों को इनसे भरपूर लाभ मिल रहा है, तथा कई सेवानिवृत्त ट्रैफिक अधिकारी इन कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं, इसलिए इन कंपनियों का कारोबार दिन दुनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और सबको समान रूप से उसका वाजिब हिस्सा भी मिल रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार विमला लाजिस्टिक के एक डायरेक्टर श्री एम. के. मिश्रा, रेलवे बोर्ड में एडीशनल मेम्बर/कमर्शियल रहे हैं. इसी प्रकार केएसके एनर्जी में कंसल्टेंट की नौकरी जीएम/द.म.रे. रहे श्री एम. एस. जयंत कर रहे हैं. जबकि बिजुरी और अनूपपुर की साइडिंग से कोयले की लोडिंग करने वाली माँ शारदा इंटरप्राइजेज के कंसल्टेंट पूर्व सीसीएम/द.पू.म.रे. श्री राधाचरण हैं. अब अगर इतने तथ्यों के बाद भी रेलवे बोर्ड को अक्ल नहीं आती है, तो इन पर अन्य जाँच एजेंसियों को ध्यान देना चाहिए. 
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और तीन जीएम का प्रस्ताव भेजा 

गया, एफसी के प्रस्ताव पर विवाद 

दक्षिण पश्चिम रेलवे/हुबली, डीएलडब्ल्यू /वाराणसी और सीएलडब्ल्यू /चितरंजन के जीएम का प्रस्ताव रेलवे बोर्ड द्वारा भेज दिया गया है. परन्तु करीब एक महीना होने जा रहा है, इस प्रस्ताव का कोई अता-पता नहीं है. पता चला है कि यह प्रस्ताव कैबिनेट सेक्रेटरी के पास पड़ा है, क्योंकि इस पर विवाद है कि श्री राधेश्याम को ओपन लाइन के बजाय प्रोडक्शन यूनिट में क्यों भेजा जा रहा है, जबकि वह एमई पद के भावी उम्मीदवार हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार जीएम/द.प.रे. के लिए श्री ए. के. मित्तल, जीएम/डीएलडब्ल्यू के लिए श्री बी. पी. खरे और जीएम/सीएलडब्ल्यू के लिए श्री राधेश्याम के नाम का प्रस्ताव किया गया है. उल्लेखनीय है कि स्टोर सर्विस के श्री मित्तल 31 जुलाई 2016 को रिटायर होंगे और अगर उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया, तो सीआरबी पद पर मित्तल को मित्तल ही रिप्लेस कर सकते हैं. उधर आश्चर्य की बात यह है कि 30 नवम्बर को खाली हो रही जीएम/सीएलडब्ल्यू की पोस्ट को तो भेजे गए प्रस्ताव में शामिल किया गया, परन्तु इसी समय एफसी पद पर पदस्थ होने के बाद खाली होने वाली एक और जीएम की पोस्ट को इस प्रस्ताव में शामिल क्यों नहीं किया गया, यह लोगों की समझ में नहीं आया है. मगर इससे ऐसा लगता है कि फ्यूचर एमई बनने की कोशिशें अभी से शुरू हो गई हैं. इसके अलावा एफसी के लिए भेजे गए प्रस्ताव में जीएम/एनएफआर कंस्ट्रक्शन श्रीमती विजयाकांत और जीएम/आईसीएफ श्री अभय खन्ना के नाम भेजे गए हैं. परन्तु हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि श्रीमती विजयाकांत का नाम श्री अभय खन्ना से एक पैनल जूनियर होने के बावजूद प्रस्ताव में न सिर्फ ऊपर है, बल्कि उन्हीं के नाम की सिफारिश भी मंत्री द्वारा की गई है. पता चला है कि श्री खन्ना ने इस पर अपना ज्ञापन यह कहते हुए प्रधानमंत्री को सौंपा है कि एफसी पर ऐसा कोई क्रायटेरिया लागू नहीं है, इसके अलावा वह श्रीमती विजायाकांत से एक पैनल (2009-10) सीनियर हैं और उनकी सीनियारिटी खुद प्रधानमंत्री ने ही सुनिश्चित की है. ऐसे में उन्हें एफसी पद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. 

प्राप्त जानकारी के अनुसार 30 नवम्बर को श्रीमती पम्पा बब्बर के रिटायर होने और श्री खन्ना के ज्ञापन के बाद विवाद हो जाने पर एएम/फाइनेंस श्रीमती दीपाली खन्ना को अगले तीन महीने के लिए एफसी पद का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया गया है. बताते हैं कि यह आदेश 30 नवम्बर को ही निकाल दिया गया था. इसका मतलब यह है कि बोर्ड को उपरोक्त दोनों अधिकारियों को एफसी बनाना ही नहीं था, यह पहले से ही तय था. बोर्ड के इस चालाकी भरे निर्णय से श्रीमती दीपाली खन्ना के लिए तो न सिर्फ बिल्ली के भाग्य से छींका टुटा, बल्कि दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा, वाली दो-दो कहावतें चरितार्थ हुई हैं. उल्लेखनीय है कि इस दौरान रेल बजट का सारा काम पूरा कर लिया जाएगा, और उसके बाद उन्हें उनकी पुरानी जगह दिखा दी जाएगी, शायद ऐसा नहीं होगा.. यह कहना है हमारे सूत्रों का. क्योंकि उनका यह फायदा उनके अक्तूबर 2012 में रिटायर्मेंट तक भी जारी रह सकता है. तथापि पीएम और पीएमओ को ब्लैकमेल करके उनसे अपने मन-मुताबिक निर्णय करा लेने की ममता बनर्जी की जैसी ख्याति बन गई है, उसे देखते हुए यदि इस बार भी वह पीएम से श्रीमती विजयाकांत के पक्ष में निर्णय करा लें, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिर उनके मंत्री ने श्रीमती विजयाकांत के नाम की ही सिफारिश की है, जो कि जून 2013 में रिटायर होंगी. 
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प्रमोटी अधिकारियों की मज़बूरी.. 

भारतीय रेल के करीब आठ हजार प्रमोटी अधिकारियों का यह एक बड़ा दुर्भाग्य है कि वह न सिर्फ अपने बड़बोले और निहायत झूठे महासचिव को झेलने के लिए मजबूर हैं, बल्कि वह चाहते हुए भी न तो उनसे इस्तीफा मांग पा रहे हैं, न ही उन्हें हटा पा रहे हैं, क्योंकि अब अगले साल उनका रिटायर्मेंट है. यही कारण है कि यह महासचिव महोदय इन प्रमोटी अधिकारियों को विभिन्न मंचों-फोरमों पर न सिर्फ बुरी तरह अपमानित करवा रहे हैं, बल्कि खुद भी अपमानित होकर अपनी बिरादरी (ग्रुप 'बी') की नाक भी कटवा रहे हैं. जबकि ग्रुप 'ए' अधिकारी और अन्य श्रम संगठन यह सारी वास्तविकता जानते हुए भी चुप हैं, क्योंकि वह चुप रहकर ही अपनी गरिमा को बचा पा रहे हैं. तथापि अपने बारे में उपरोक्त तमाम सच्चाई को जानते हुए भी इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के यह महासचिव महोदय इतने निर्लज्ज हो गए हैं कि फिर भी उनका झूठ बोलना, बरगलाना, गलत जानकारियां देना और बोर्ड मेम्बरों, सीआरबी सहित कुछ महाप्रबंधकों एवं विभिन्न विभाग प्रमुखों को अपना लंगोटिया यार बताना अथवा अपना क्लासमेट बताकर अपना रुतबा झाड़ना फिर भी नहीं छूटा है. 

हाल ही में उत्तर रेलवे बड़ोदा हाउस में एक मीटिंग के दौरान जो वाकया पेश आया, उसके बाद तो इन बड़बोले महासचिव महोदय को कहीं अपना मुंह नहीं दिखाना चाहिए था. बताते हैं कि उक्त मीटिंग में जब यह बोल रहे थे, तब कुछ अधिकरियों ने इन्हें टोका, तो इन्होंने यह कहकर उन्हें चुप करा दिया कि 'जब वह बोलते हैं तो कोई बोर्ड मेम्बर और यहाँ तक कि सीआरबी भी बीच में उन्हें टोकने की हिम्मत नहीं करते हैं.' इसके थोड़ी देर बाद ही जब इन्हें एफए एंड सीएओ/उ.रे. ने टोका, तो इन्होंने उन्हें भी वैसे ही उपरोक्त डायलाग मारने की शुरुआत की ही थी कि एफए एंड सीएओ/उ.रे. ने न सिर्फ इन्हें जोर से डांट दिया, बल्कि बताते हैं कि एक भद्दी सी गाली भी दी और कहा कि वह अपना रौब बोर्ड मेम्बरों को ही जाकर दिखाएं, यहाँ ज्यादा विशेषज्ञता झाड़ने की कोशिश न करें और अपनी हैसियत में ही रहें. इसके बाद इन महासचिव महोदय की बोलती बंद हो गई और इन्हें न तो अन्य श्रम संगठनों के पदाधिकारियों, और न ही अन्य अधिकारियों/सहभागियों में से किसी का भी समर्थन/सहयोग मिला, और यह अपना-सा मुंह लेकर रह गए थे. 

ऐसा ही एक वाकया रेलवे बोर्ड की एक मीटिंग में तब पेश आया था, जब इन्होंने नई दिल्ली स्टेशन पर प्लास्टर तोड़कर वहां नया ग्रेनाईट लगाए जाने सम्बन्धी भ्रष्टाचार की बात उठाई थी. बताते हैं कि जैसे ही इन्होंने यह बात उठाई, वैसे ही सीआरबी ने इन्हें पूरे फोरम के सामने ही यह कहकर लगभग डपटते हुए चुप करा दिया कि 'हम जानते हैं कि तुम लोग क्या करते हो, चुप रहो.. पहले अपना आचरण सुधारो, तब दूसरों की तरफ ऊँगली उठाना.' हालाँकि अंत में इनके ध्यानमग्न अध्यक्ष महोदय ने स्थिति को संभाला और प्रमोटियों की गरिमा को कुछ हद तक सुरक्षित किया. तथापि महासचिव महोदय के उच्श्रंखल आचरण से प्रमोटियों की गरिमा का जो नुकसान होना था, वह तो हो ही चुका था. 

इसके अलावा डीपीसी में डिले, बैक डेट से डीपीसी को लागू करवाने, जोनल से नेशनल सीनियारिटी बदलवाने, फिर उसमे भी मेनीपुलेशन करने, फेडरेशन को चंदा उगाही का माध्यम बना दिए जाने, तमाम बड़बोलेपन के बावजूद 5400 ग्रेड पे को अब तक हासिल न कर पाने और ग्रुप 'ए' में 50:50 प्रतिशत कोटा आरक्षण सुनिश्चित न करवा पाने और आलोचना से बचने के लिए अगले 10-20 सालों में 90 प्रतिशत प्रमोटियों के जेएजी और एसएजी में पहुँचने, जैसे प्रलोभन देकर प्रमोटियों को बरगलाने आदि-आदि, इन तमाम वास्तविकताओं से सभी ग्रुप 'बी' अधिकारियों का मोह भंग हो चुका है. फेडरेशन के कोषाध्यक्ष और एक जोन के जनरल सेक्रेटरी के साथ पिछले दिनों घटी घटना के सम्बन्ध में एक बार फिर इन महासचिव महोदय ने अपनी आदत के मुताबिक मुंबई में गलत और अत्यंत घटिया जानकारी दी. इन्होंने वहां उपस्थित अधिकारियों को बताया कि 'वह तो अच्छा हुआ कि कोषाध्यक्ष ने जिस कर्मचारी को मारा था, उसका मेडिकल नहीं कराया गया, और पुलिस केस नहीं बना, क्योंकि जिसे मारा था, उसके कान का पर्दा फट गया था, जो कि एक संगीन अपराध है, इस पर पुलिस में बहुत ही संगीन अपराधिक मामला दर्ज हो सकता था...!' जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. परन्तु यह सब लफ्फाजी करना इन महासचिव महोदय की आदत में शुमार हो गया है और अब इनकी इस आदत को बदल पाना इनके या किसी के वश में नहीं है. 

तथापि अब फेडरेशन की एजीएम कोलकाता में 26-27 दिसंबर को जिस तरह यह कराने जा रहे हैं, उसमे न सिर्फ भारी मतभेद हैं, बल्कि इस एजीएम के दौरान वहां यदि आपस में ही जूतमपैजार हो जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. इन महासचिव महोदय की यह शायद आखिरी एजीएम है, इसलिए यह पीपीपी, जिसका अब कोई औचत्य नहीं रह गया है क्योंकि यह कंसेप्ट फेल हो चुका है, पर सेमिनार के बहाने रेलमंत्री और सीआरबी सहित तमाम बोर्ड मेम्बरों को इकठ्ठा करके कुछ कर दिखाना चाहते हैं, और एक बार फिर सभी प्रमोटियों से इस बहाने लाखों रुपये इकठ्ठा कर रहे हों, तो कोई नई बात नहीं होनी चाहिए. जबकि बताते हैं कि अभी तक पिछले सेमिनार में इकठ्ठा की गई लाखों रुपये की राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं हुआ है. परन्तु जब पूर्व रेलवे, जहाँ यह एजीएम और सेमिनार करवाया जा रहा है, आयोजक/मेजबान नहीं है, और दक्षिण पूर्व रेलवे के तमाम प्रमोटी अधिकारी ही सहमत/एकजुट नहीं हैं, और आयोजक के तौर पर ही भारी विवाद है, तब ऐसे में उपरोक्त बोर्ड मेम्बर और अन्य मान्यवर इस अवसर पर उपस्थित होकर शायद अपनी गरिमा ही गंवाएँगे. 
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Sunday, November 13, 2011


रेल किराया वृद्धि को लेकर भारी पशोपेश में रेलमंत्री 

नयी दिल्ली : रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी आजकल बड़ी पशोपेश में हैं. रेल किराए बढ़ाए जाने को लेकर उन पर चौतरफ़ा दबाव पड़ रहा है. रेलमंत्री पर यह दबाव वित्त मंत्रालय, योजना आयोग और रेलवे बोर्ड के बाबुओं तथा रेलवे के मान्यता प्राप्त श्रम संगठनों की तरफ से पड़ रहा है, जो कि रेल किरायों में कम से कम 30% की बढ़ोत्तरी अविलम्ब चाहते हैं. परन्तु केंद्र में सत्ता की प्रमुख भागीदार तृणमूल कांग्रेस की मुखिया एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और वास्तविक रेलमंत्री ममता बनर्जी नहीं चाहती हैं कि डीजल-पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का पुरजोर विरोध करने और इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापसी तक की घोषणा कर डालने के बाद रेल किरायों में वृद्धि का ठीकरा उन पर और उनकी पार्टी पर फोड़ा जाए. इसलिए योजना आयोग, वित्त मंत्रालय और रेलवे बोर्ड के बाबुओं के भारी दबाव के बावजूद वह श्री त्रिवेदी को रेल किराए बढ़ाने की अनुमति नहीं दे रही हैं. रेलवे बोर्ड के तमाम बाबू लोग भी यह मानते हैं की ममता बनर्जी की सहमति मिले बगैर किराए बढ़ाना न तो रेलवे बोर्ड और न ही केंद्र सरकार के वश की बात है. 

यह सर्वज्ञात है कि रेलवे के असीमित संसाधनों का (दुरु) उपयोग करके ममता बनर्जी ने वामपंथियों से पश्चिम बंगाल में अपनी चिरप्रतीक्षित सत्ता हासिल की है. उन्हें यह खूब अच्छी तरह पता है कि पश्चिम बंगाल में कीमतें बढ़ने और खासतौर पर रेल किराए बढ़ने पर बंगाली भद्रलोक में कितना जबरदस्त आक्रोश पैदा होता है. इसीलिए बात-बात पर सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करके उसे ब्लैकमेल करने वाली ममता बनर्जी के लिए रेल किराए बढ़ाने की अनुमति देना आसान नहीं होगा. ज्ञातव्य है कि डीजल-पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर सरकार से समर्थन की घोषणा करके ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री से एक तरफ रेलवे में अपने मनमुताबिक महाप्रबंधकों की पोस्टिंग करा ली है, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के लिए केंद्र सरकार से 19000 करोड़ रु. का विशेष पैकेज हासिल कर लिया है. 

रेलवे बोर्ड के कई अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि ममता बनर्जी की हरी झंडी के बिना रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी रेल किराए बढ़ाए जाने के मामले में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं. हालाँकि करीब चार महीने पहले रेल मंत्रालय का कार्यभार सँभालने के बाद से श्री त्रिवेदी कई मंचों पर कह चुके हैं कि रेलवे की वित्तीय हालत बहुत ख़राब है. यही बात वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी भी कई बार कह चुके हैं. जबकि योजना आयोग ने बिना रेल किराए बढ़ाए किसी प्रकार की योजनागत राशि की मंजूरी देने से मना कर दिया है. वित्तमंत्री और योजना आयोग दोनों का मानना है कि रेल किरायों में अविलम्ब वृद्धि की जानी चाहिए, क्योंकि रेलवे की वित्तीय हालत सुधारने का इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है. योजना आयोग का तो यह भी मानना है कि रेल किरायों का एक स्थाई मेकेनिज्म बना दिया जाना चाहिए, जिससे तेल एवं बिजली की कीमतों में वृद्धि होने के बाद उसी अनुपात में रेल किराए स्वतः बढ़ा दिए जाएं. 

रेलवे बोर्ड के अधिकाँश अधिकारियों का यह भी मानना है कि तेल और ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोत्तरी अब एक सामान्य बात हो गई है, जबकि यात्रियों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे की लागत और रख-रखाव तथा चल-अचल परिसंपत्तियों में लगातार वृद्धि करनी पड़ रही है. उनका कहना है कि रेल किरायों को तेल और ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोत्तरी से जोड़ने के बजाय रेल किराए में प्रतिवर्ष एक औसत वृद्धि का एक स्थाई तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए. इस सबके अलावा उनका यह भी मानना है कि अब बहुत हो चुका, अब रेलवे का राजनीतिक इस्तेमाल बंद होना चाहिए और इसे स्वतंत्र रूप से एक वाणिज्य परिवहन संस्थान के तौर पर चलने के लिए खुला छोड़ दिया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वे रेलवे के निजीकरण की बात कह रहे हैं. 

रेल अधिकारियों का कहना है कि आम जनता यानि यात्रियों से रेल किराए बढ़ाए जाने पर रायशुमारी करने की बात ही बेमानी है, क्योंकि कोई भी भारतीय आदमी स्वतः कभी अपनी जेब पर बोझ नहीं डालना चाहता, यह इस देश की सर्वसामान्य मानसिकता है. उनका यह भी कहना था कि आम आदमी को भी यह मालूम है कि पिछले 10 सालों से रेलवे के किराए नहीं बढ़े हैं, इसलिए अब वह भी इनके बढ़ाए जाने पर सहमत हैं. उनका कहना था कि यात्री को बेहतर सहूलियतें चाहिए, अगर वह किराया बढ़ाकर नहीं देगा, तो उसे यह सहूलियतें कैसे मिल पाएंगी, यह भी वह समझता है, इसलिए वह बढ़ा हुआ रेल किराया देने के लिए खुश-ख़ुशी तैयार है. अधिकारियों का कहना था कि गत 10 वर्षों में रेल की परिचालन लागत करीब 25 से 30 प्रतिशत बढ़ गई है, जबकि गत वित्तवर्ष में रेलवे को यात्री किरायों की मद में लगभग 25000 करोड़ रु. का घाटा हुआ है, जो कि चालू वित्तवर्ष में बढ़कर करीब 35000 करोड़ रु. हो जाने का अनुमान लगाया गया है. हालाँकि उनका यह भी कहना था कि रेलमंत्री अपनी रायशुमारी भले ही कर लें, मगर इस मामले में अंतिम राय तो उन्हें कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग से ही लेनी पड़ेगी. 
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विवेक सहाय, पीएमओ, डीओपीटी, 
सीवीसी और रेलवे बोर्ड को राहत 
चार-चार विजिलेंस मामले पेंडिंग होने के बावजूद पीएमओ, डीओपीटी और सीवीसी की अंदरूनी अंडरस्टैंडिंग के तहत विवेक सहाय को पहले मेम्बर ट्रैफिक और बाद में सीआरबी बनाए जाने के खिलाफ 'रेलवे समाचार' द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका (पीआईएल) को दिल्ली हाई कोर्ट के नए चीफ जस्टिस श्री ए. के. सिकरी और जस्टिस श्री राजीव सहाय की बेंच ने 2 नवम्बर को ख़ारिज कर दिया. इससे न सिर्फ विवेक सहाय को, बल्कि पीएमओ, डीओपीटी और सीवीसी को भी भारी राहत मिल गई है. हालाँकि कोर्ट ने इनमे से किसी को भी किसी भी प्रकार से दोषमुक्त नहीं किया है, और न ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई विपरीत टिप्पणी की है, और न ही कोई पेनाल्टी लगाई है. परन्तु जिस ग्राउंड पर यह याचिका पूर्व चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्र और जस्टिस श्री संजीव खन्ना की पीठ ने दाखिल (एडमिट) की थी, उसे नजरअंदाज करके और याचिकाकर्ता के वकीलों की पूरी बात और बहस को सुने बिना या संज्ञान में लिए बिना जिस तरह से कोर्ट ने यह याचिका मात्र दो मिनट में ख़ारिज कर दी, वह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. कोर्ट का कहना था कि सम्बंधित अधिकारी रिटायर हो गया है और को-वारंटो का मामला नहीं बनता है, जबकि सम्बंधित अधिकारी के निकट भविष्य में रिटायर हो जाने के ग्राउंड पर यह याचिका कोर्ट ने दाखिल ही नहीं की थी, बल्कि यह याचिका तो कोर्ट ने इस ग्राउंड पर एडमिट की थी कि भविष्य में वरिष्ठ एवं योग्य अधिकारियों को दरकिनार करते हुए और विजिलेंस मामले पेंडिंग रहते हुए किसी अधिकारी को उपरोक्त उच्च पदों पर प्रमोट न किया जा सके, इस बारे में कोर्ट द्वारा दिशा-निर्देश दिए जाने के ग्राउंड पर यह याचिका एडमिट की गई थी. तब इसकी विस्तृत सुनवाई किए बिना और अपेक्षित दिशा-निर्देश जारी किए बिना इस याचिका को मात्र दो मिनट में ख़ारिज कर दिया जाना वास्तव में ही दुर्भाग्यपूर्ण है. अब इसका परिणाम यह होगा कि रेल मंत्रालय के बाबुओं और निहितस्वार्थी राजनीतिज्ञों का गठजोड़ अब और ज्यादा निरंकुश हो जाएगा. इसका ताज़ा उदाहरण श्री राजीव भार्गव का मामला है, जिन्हें प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2008-09 के जीएम पैनल में पुनर्स्थापित किए जाने के बावजूद रेलवे बोर्ड के कुछ बाबुओं और राजनीतिज्ञों ने अपने निहितस्वार्थवश दरकिनार करके रख दिया है. 

उल्लेखनीय है कि पिछली तारीख में माननीय जजों ने याचिकाकर्ता के वकीलों द्वारा सीवीसी और पीएमओ तथा डीओपीटी के अबतक जवाब दाखिल न किए जाने पर सवाल उठाए जाने पर नाराजगी जताते हुए उनके वकीलों को अपने जवाब अगली तारीख से पहले कोर्ट में दाखिल करने और इस मामले में को-वारंटो क्यों नहीं लागू हो सकता, इस पर कोर्ट को संतुष्ट करने का आदेश दिया था. पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्र और न्यायाधीश श्री संजीव खन्ना की पीठ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार यह मामला भी को-वारंटो, (रिटायर्मेंट के बाद भी नियुक्ति ख़ारिज हो जाने), का है. इस पर रेलवे के वकील श्री वेंकटरमणी ने कहा था कि यह मामला को-वारंटो का नहीं है, तब विद्वान न्यायाधीशों ने कहा था कि अगली तारीख में वह कोर्ट को संतुष्ट करें और यह भी स्पष्ट करें कि इस मामले में को-वारंटो क्यों नहीं लागू हो सकता है? इस बात का भी वर्तमान पीठ ने कोई संज्ञान नहीं लिया. इसके अलावा इस मामले में प्रधानमंत्री से फ़ाइल पर 'सब्जेक्ट टू विजिलेंस क्लियरेंस' लिखवाए जाने से लेकर चार दिनों की राष्ट्रीय छुट्टियों के दौरान सीवीसी का विजिलेंस क्लियरेंस मैनेज किए जाने और उसी दिन 28 दिसंबर 2009 को रात को 8 बजे तत्काल नियुक्ति आदेश जारी कर दिए जाने, इसके ठीक 23 दिन बाद 20 जनवरी 2010 को सीवीसी द्वारा पेंडिंग विजिलेंस मामलों की जाँच रिपोर्ट से संतुष्ट न होने और अगले 15 दिनों में जाँच करके नई जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहकर विजिलेंस क्लियरेंस वापस ले लिए जाने तथा मार्च 2010 को आरटीआई में दिए गए जवाब में सीवीसी द्वारा सम्बंधित मामलों में जाँच पेंडिंग होने की जानकारी दिए जाने, नियमानुसार प्रापर विजिलेंस क्लियरेंस के बिना नियुक्ति प्रस्ताव में सम्बंधित अधिकारी का नाम भी नहीं डाले जा सकने की प्रक्रिया आदि-आदि तमाम महत्वपूर्ण तथ्यों को भी कोर्ट ने अपने संज्ञान में लेना जरूरी नहीं समझा. यह सीधा-सीधा तिकड़मबाजी और रेलवे बोर्ड के बाबुओं एवं राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट गठजोड़ का साफ़-साफ़ मामला था, इसके अलावा यह मामला पी. जे. थामस की सीवीसी पद पर हुई विवादास्पद नियुक्ति के समकक्ष का मामला भी था, जिससे केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री एक बार फिर से विवादों में घिर सकते थे. तथापि दुर्भाग्यवश माननीय न्यायाधीशों ने इन तमाम अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यों पर समुचित संज्ञान न लेकर इस भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारना जरूरी नहीं समझा, यह इस मामले का अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है. 

दो नवम्बर की तारीख के दिन कोर्ट के सामने रेलवे बोर्ड के वकील जिस तरह चहक रहे थे, जबकि पिछली तीन तारीखों में कोर्ट के सामने उनकी आवाज भी नहीं निकल रही थी, बल्कि तब तो उन पर तैयारी करके न आने, पिटीशन पढ़कर न आने और रेलवे बोर्ड द्वारा उन्हें उचित फीडबैक न दिए जाने, याचिकाकर्ता द्वारा अपनी पिटीशन में पहले ही सम्बंधित अधिकारी के 30 जून को रिटायर हो जाने की बात लिखे जाने जैसी कोर्ट की फटकार पड़ रही थी, और इसके साथ मामला बोर्ड पर आते ही पीठ का जो रवैया नजर आया, वह कुछ और ही तरफ इशारा करता है. मगर यही तो इस देश और इसकी संपूर्ण व्यवस्था की मज़बूरी है कि जहाँ वास्तव में गंभीरतापूर्वक ध्यान दिए जाने की जरूरत है, वहीँ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इस गंभीर एवं तथ्यपूर्ण मामले को जिस तरह से कोर्ट द्वारा ख़ारिज किया गया है, उससे रेलवे के लाखों अधिकारियों और कर्मचारियों को घोर निराशा हुई है. इसके अलावा उस दिन रेलवे बोर्ड के वकीलों ने जिस तरह याचिकाकर्ता का चरित्र हनन करने की कोशिश की, वह एक बार फिर विवेक सहाय की कुत्सित एवं घृणित मानसिकता का द्योतक बन गई. हमें बखूबी मालूम है कि मुंबई की एक 'मोटी और चरित्रहीन' मगर तथाकथित अंग्रेजीदां महिला पत्रकार के माध्यम से माटुंगा वर्कशाप के एक लबलबहे एसएसई से एक पेपर कटिंग मंगवाकर विवेक सहाय ने रेलवे बोर्ड के वकीलों को उसे याचिकाकर्ता के खिलाफ 'मजबूत सबूत' के तौर पर दिया था, जिसका हवाला वे कोर्ट में दे रहे थे. हालाँकि कोर्ट ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, मगर यदि कोर्ट ने ध्यान दिया भी होता, तो भी विवेक सहाय और रेलवे बोर्ड के वकील याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ भी साबित नहीं कर पाते. बहरहाल, पीएमओ, डीओपीटी और सीवीसी तथा महातिकड़मी विवेक सहाय के सामने याचिकाकर्ता की हैसियत नगण्य है, मगर फिर भी इस याचिका के कारण सर्वप्रथम विवेक सहाय को सेवा विस्तार नहीं मिल पाया और तत्पश्चात सेवानिवृत्ति के पहले और बाद में भी उन्हें कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला, यह एक संतोष की बात है. तथापि जिस तरह इस गंभीर एवं तथ्यपूर्ण याचिका को ख़ारिज किया या कराया गया है, उसे ध्यान में रखते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की तैयारी की जा रही है. 

आखिर हुई 11 नए जीएम्स की पोस्टिंग 

रेलवे बोर्ड के बाबुओं को कब आएगी सदबुद्धि


नयी दिल्ली : आखिर करीब 10 महीने के बाद 13 जीएम्स की पोस्टिंग्स के आदेश रेलवे बोर्ड ने बुधवार, 9 नवम्बर की शाम करीब 6 बजे जारी कर दिए. इस प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री ने मंगलवार, 8 नवम्बर को सुबह 11 बजे अपने हस्ताक्षर कर दिए थे. बुधवार, 9 नवम्बर को दोपहर बाद डीओपीटी से बोर्ड पहुंची इस फ़ाइल पर आनन्-फानन कार्रवाई करते हुए बोर्ड ने तुरंत सभी 13 जीएम्स के पोस्टिंग आर्डर सिर्फ इसलिए जारी कर दिए, चूँकि अगले दिन गुरुवार, 10 नवम्बर को गुरु नानक जयंती की राष्ट्रीय छुट्टी थी, इसलिए किसी संभावित अधिकारी द्वारा इसको कोर्ट में चुनौती देकर स्टे आर्डर ले लिए जाने की भी बोर्ड को कोई आशंका नहीं थी. इसके अलावा यहाँ यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि ममता बनर्जी की ब्लैकमेलिंग के सामने एक बार फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हथियार डाल दिए. वरना कोई कारण नहीं था कि करीब एक महीने पहले लिए गए अपने ही निर्णय को नजरअंदाज करते हुए वह इन पोस्टिंग प्रस्तावों पर इस तरह हड़बड़ी में हस्ताक्षर कर देते? उल्लेखनीय है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि पर सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की ममता बनर्जी की धमकी प्रधानमंत्री द्वारा जीएम्स की पोस्टिंग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते ही 'आगे से उनसे पूछे बिना कीमतें नहीं बढाए जाने' के सुर में बदल गई. बहरहाल, आर्डर मिलते ही सभी 13 अधिकारियों ने अपना-अपना पदभार संभाल लिया है. जैसा कि 'रेलवे समाचार' ने पहले प्रकाशित किया था, दो लेटरल ट्रांसफ़र के साथ नए पदस्थ किए गए जीएम्स के नाम इस प्रकार हैं.. 

1. श्री राजीव भार्गव, आरडब्ल्यूएफ, बंगलौर. 2. श्री अभय खन्ना, आईसीएफ, पेरम्बूर. 3. श्री बी. एन. राजशेखर, आरसीएफ, कपूरथला. 4. श्री सुबोध कुमार जैन, म. रे., सीएसटी, मुंबई. 5. श्री अरुणेन्द्र कुमार, द. पू. म. रे., बिलासपुर. 6. श्री महेश कुमार, प. रे., चर्चगेट मुंबई. 7. श्री ए. के. वर्मा, द. पू. रे., गार्डेन रीच, कोलकाता. 8. श्री जी. सी. अग्रवाल, पू. रे., फेयरली प्लेस, कोलकाता. 9. श्री एस. वी. आर्य, प. म. रे., जबलपुर. 10. श्री इन्द्र घोष, पू. त. रे., भुवनेश्वर. 11. श्री जगदेव कालिया, आरई/कोर, इलाहबाद. 12. श्री वरुण बर्थुआर, पू. रे. से पू. म. रे., हाजीपुर. 13. श्री जी. एन. अस्थाना, प. म. रे. से द. म. रे., सिकंदराबाद. 

प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री राजीव भार्गव ने आरडब्ल्यूएफ, बंगलौर में ज्वाइन नहीं किया है. ज्ञातव्य है की 7 अक्तूबर को प्रधानमंत्री ने श्री भार्गव को वर्ष 2008-09 के जीएम पैनल में पुनर्स्थापित करते हुए उन्हें ओपन लाइन के लिए फिट कर दिया था, जिसके अनुरूप उनकी पोस्टिंग कम से कम ओपन लाइन जीएम के तौर पर होनी चाहिए थी. मगर ममता बनर्जी की ब्लैकमेलिंग के सामने मजबूर प्रधानमंत्री ने अपने ही निर्णय को नजरअंदाज करते हुए बोर्ड द्वारा भेजे गए पोस्टिंग प्रस्ताव पर ज्यों का त्यों हस्ताक्षर कर दिया. जबकि उन्होंने रेलमंत्री के निर्णय को ओवर रूल करते हुए अपना यह निर्णय लिया था. ऐसे सिद्धांतविहीन प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद की जा सकती है जो अपनी पार्टी की राजनीतिक मजबूरियों के सामने नतमस्तक होकर अपने द्वारा ही किए गए न्याय को अन्याय में बदल देने में भी कोई देर नहीं लगाता है? ऐसे प्रधानमंत्री से सीआरबी और डीपीसी तथा एसीसी के खिलाफ कोई स्ट्रक्चर पास किए जाने और उन्हें टेकअप किए जाने की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है? इसके साथ ही जो रेलमंत्री बार-बार एक ही गलती को दोहरा रहा हो, उससे भी किसी न्याय की अपेक्षा नहीं की जा सकती है. 

इसके अलावा जिन विनय मित्तल को सीआरबी बनाने का प्रस्ताव तक रेलवे बोर्ड ने नहीं भेजा था, नियम के हिसाब से कैबिनेट सेक्रेटरी ने उन्हें सीआरबी बनाया, मगर अब वह भी कैबिनेट सेक्रेटरी की बात नहीं मान रहे हैं और उन्हें धोखा देने पर उतर आए हैं. ऐसा लगता है कि खैरात में मिली सीआरबी की पोस्ट पर विराजमान श्री मित्तल एक मामूली क्लर्क या खलासी बनकर रह गए हैं, क्योंकि उन्हें यह भी समझ में नहीं आता है कि नियमानुसार जूनियर को ओपन लाइन और सीनियर को प्रोडक्शन यूनिट में नहीं भेजा जा सकता है. हालाँकि ये बात अलग है कि पिछले तीन साल से रेलवे बोर्ड और भारतीय रेल में कोई नियम-नीति रह ही नहीं गई है. तथापि इस मसले का हल वर्ष 2008-09 के पैनल से पदस्थ हुए सबसे जूनियर जीएम को एक महीने की छुट्टी पर भेजकर उसकी जगह श्री भार्गव को एक महीने के लिए पदस्थ करके सामान्य तौर पर किया जा सकता था, जैसा कि अधिकारियों को एडजस्ट करने के लिए अब अक्सर होता रहता है.. इसके बाद श्री भार्गव को अन्य किसी रेलवे में लेटरल ट्रान्सफर करके सारी स्थिति को सामान्य किया जा सकता था. मगर ऐसा तो तब होता है जब रेलवे बोर्ड में स्वस्थ मानसिकता के बाबू लोग बैठे हों, जबकि यहाँ तो वे अब अहसान फरामोशी पर उतारू हो गए हैं. 

रेलवे बोर्ड द्वारा मीडिया को जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में जीएम्स की पोस्टिंग करवाने का श्रेय रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी को दिया गया है. अब यह प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले 'चारणों' को कौन समझाए कि उनको यह श्रेय तो तब होता जब चार महीने पहले रेलमंत्री का पद भार सँभालने के फ़ौरन बाद उन्होंने जीएम्स की यह पोस्टिंग्स करवा दी होतीं. वस्तुस्थिति यह है कि श्री त्रिवेदी पर्याप्त रूप से काबिल होने के बावजूद ममता बनर्जी की छाया मात्र बनकर रह गए हैं, क्योंकि सच्चाई यह है कि आज भी रेल सम्बन्धी सारे फैसले ममता बनर्जी ही ले रही हैं. स्थिति यह है कि पच्शिम बंगाल में दर्जनों गाड़ियों का उदघाटन रोज़ हो रहा है, मगर रेलमंत्री वहां मंच पर सिर्फ एक शो-पीस की तरह उपस्थित होते हैं, जबकि गाड़ियों का उदघाटन और भाषण ममता बनर्जी करती हैं. तभी तो भारतीय रेल मरणासन्न स्थिति में पहुँच रही है. इसीलिए तो अब सारे रेल अधिकारी और कर्मचारीगण ईश्वर से यह प्रार्थना करने लगे हैं कि वह रेलवे बोर्ड के बाबुओं को थोड़ी सद्बुद्धि दे, जिससे वे अपने राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर रेल को बचाने पर अपनी सारी काबिलियत का इस्तेमाल कर सकें.